भारत में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण व्यवस्था एक संवैधानिक व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य अतीत में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े समुदायों को न्याय देना है। कई समुदाय आज भी अपने सामाजिक पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुड़मी (Kudmi / Kûdumi / Kurmi-Mahato) समुदाय उनमें से एक है, जो अलग-अलग राज्यों में ST दर्जा पाने की मांग कर रहा है। हाल ही में कुड़मी समुदाय ने “रेल रोको / रेल टेका” आंदोलन किया है। इस आंदोलन का उद्देश्य है कि केंद्र एवं राज्य सरकार उन्हें ST सूची में शामिल करें।
लेकिन सवाल यह है: क्या इस आंदोलन से वाकई कुड़मियों को ST दर्जा मिल सकता है? इसके लिए हमें ऐतिहासिक, कानूनी एवं सामाजिक परिस्थितियों को समझना होगा।
कुड़मी समुदाय: पृष्ठभूमि और स्थिति

- कुड़मी कौन हैं?
- कुड़मी (Kudmi / Kurmi-Mahato) समुदाय झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा आदि राज्यों में पाए जाते हैं।
- ये कृषि प्रधान समुदाय हैं और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक, रीति-रिवाजों, भाषा (जैसे कुरमाली / कुडमाली) और परंपराओं का पालन करते हैं।
- इतिहास और पिछली स्थिति
- पहले ब्रिटिश काल में कुछ सरकारी दस्तावेजों में कुड़मियों को “Primitive Tribe” या आदिम जाति श्रेणी में लिया गया था।
- लेकिन जब भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की और 1950 में अनुसूचित जनजातियों की सूची तैयार की गई, तो कुड़मी समुदाय को ST सूची से बाहर रखा गया।
- बाद में विभिन्न राज्यों में उन्हें Other Backward Classes (OBC) की श्रेणी में रखा गया है।
- मांग और आंदोलन
- पिछले कई वर्षों से कुड़मी समुदाय विभिन्न स्तरों पर ST दर्जा देने की मांग कर रहा है।
- 2025 में कुड़मी समाज ने “रेल टेका / रेल रोको” आंदोलन किया, रेलवे मार्गों को अवरुद्ध किया, ताकि उनका मुद्दा केंद्र और राज्य सरकारों के समक्ष आए।
- आंदोलन में ट्रेनों की रद्दीकरण, मार्गों का विचलन और यात्री अव्यवस्था हुई।
- विरोध और चुनौतियाँ
- अन्य जनजातीय संगठनों ने इस मांग का विरोध किया है, क्योंकि यदि नए समुदाय को ST दर्जा मिलेगा, तो सीमित आरक्षण संसाधनों (जैसे शिक्षा, सरकारी नौकरियाँ, आरक्षण की कुर्सियाँ) पर दबाव बढ़ सकता है।
- सरकार स्तर पर इस विषय पर विभिन्न अध्ययन, रिपोर्ट और समीक्षा जारी हैं। कई बार राज्य सरकारों ने प्रस्ताव भेजे हैं लेकिन केंद्र ने अभी तक उन्हें मंज़ूर नहीं किया।
आंदोलन से ST दर्जा मिलने की संभावना: विश्लेषण
नीचे मैं इस बात के पक्ष और विपक्ष दोनों पक्षों की संभावनाएँ और बाधाएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:
पक्ष (संभावनाएँ)
- जनसमर्थन और राजनीतिक दबाव
- बड़े पैमाने पर आंदोलन, जनता की भागीदारी और मीडिया कवरेज, सरकारों पर दबाव बना सकते हैं।
- यदि राज्य सरकारें इस मुद्दे को हिमायत करती हैं और इसे केंद्र सरकार के समक्ष उठाती हैं, तो यह लोक-स्मरण में रहेगा।
- ऐतिहासिक दावा
- कुछ दस्तावेजों में कुड़मी समुदाय को पहले आदिम जाति श्रेणी में लिया गया था और यह दावा किया जाता है कि उन्हें त्रुटिपूर्ण तरीके से सूची से बाहर किया गया।
- यदि सामाजिक-नृवंशीय अनुसंधान (ethnographic studies) यह साबित कर सके कि उनकी संस्कृति, जीवनशैली और सामाजिक असम्यता जनजातीय समुदायों के समान है, तो यह समर्थन बढ़ा सकता है।
- कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया
- ST सूची में शामिल करने की प्रक्रिया संविधान द्वारा निर्धारित है (अनुच्छेद 342 आदि)। यदि केंद्र सरकार, संसद और संबंधित आयोग समर्थन दें, तो यह संभव है।
- राज्यों की सिफारिश, अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) की रिपोर्ट, लोकसभा/राज्यसभा में प्रस्ताव आदि मार्ग संभव हैं।
विपक्ष (चुनौतियाँ)
- आरक्षण संसाधन की सीमा
- ST समुदायों को मिले आरक्षण संसाधन सीमित हों, इसलिए नए समुदाय को शामिल करना मौजूदा ST समुदायों के हिस्से को प्रभावित कर सकता है।
- अन्य जनजातीय संगठनों का विरोध, यह कह कर कि नए समुदाय को शामिल करने से उनकी हिस्सेदारी कम होगी।
- नृवंशीय, सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर
- यह साबित करना होगा कि कुड़मी समुदाय की सामाजिक, भाषा, रीति-रिवाज आदि विशेषताएँ अन्य जनजातीय समुदायों के समान या तुलनात्मक हों।
- यदि शोध या रिपोर्ट यह दिखाती हैं कि वे अन्य पिछड़े कृषि समुदायों की तरह हैं, न कि जनजातीय संस्कृति के अनुरूप, तो विरोध होगा।
- राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक बाधाएँ
- केन्द्र और राज्य सरकारों को इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए।
- संवैधानिक प्रक्रिया, मंत्रिपरिषद् अनुमोदन, संसद द्वारा विधेयक आदि कदमों में समय, राजनीतिक मनोबल और संसाधन चाहिए।
- अतीत में कई प्रस्ताव और सिफारिशें आई हैं, लेकिन उन्हें स्थायी रूप से लागू नहीं किया गया।